भारतीय लोकसंगीत जगत में कुछ ऐसे कलाकार होते हैं जो सिर्फ़ सुर और ताल नहीं गढ़ते, बल्कि समाज की गहराइयों में उतरकर लोगों के दिलों की ज़ुबान बन जाते हैं। प्रहलाद सिंह टिपानिया ऐसे ही कलाकार हैं — लोक संगीत के उस स्वरूप के वाहक जो न सिर्फ़ गीत हैं बल्कि संदेश, दर्शन, जीवन दृष्टि और मानवता की ख़ुशबू लेकर चलते हैं।
प्रारंभिक जीवन और पृष्ठभूमि
प्रहलाद सिंह टिपानिया का जन्म ७ सितंबर १९५४ को मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र के ताराना ज़िले में, लुनियाखेड़ी गाँव में हुआ। उनके परिवार की सामाजिक पृष्ठभूमि मालवी बलाई जाति की थी। वहाँ की ग्रामीण परिवेश, लोक परंपराएँ, आम लोगों की ज़िन्दगी के संघर्ष, सरलता और मानवता — ये सब कुछ ने उनके व्यक्तित्व और कला की नींव रखी।
उन्होंने अपनी शिक्षा भी दूरस्थ और सीमित संसाधनों में पाई। उन्होंने हिन्दी में स्नातक (B.A.) की उपाधि वर्ष १९८० में और इतिहास में स्नातक व परे आगे की पढ़ाई की, साथ ही विज्ञान व गणित विषयों में शिक्षण कार्य भी किया।
लोक संगीत और कबीर का योगदान
टिपानिया जी की विशिष्ट कला है कबीर की कविताओं (भजनों) को लोक संगीत की शैली में प्रस्तुत करना। खासकर मालवी लोक रचनाएँ, मंजीरा, खटकल (खरताल), तम्बूरा, ढोलक, हारमोनियम, तिमकी वाँ अन्य पारंपरिक यंत्रों के साथ।
उनकी आवाज़ में एक सादगी है, एक निवेदन है — ऐसा नहीं कि आप सिर्फ़ सुनते हों, बल्कि महसूस करते हों।
कला की यात्रा और मान्यताएँ
टिपानिया जी ने सिर्फ़ गाँवों में नहीं सुर जगत में ही नाम कमाया, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी उनके कार्यक्रम हुए। उन्होंने “América Me Kabir Yatra”, “Had-Anhad” जैसी यात्राओं में भाग लिया है जिसमें उन्होंने यूके, अमेरिका, पाकिस्तान समेत कई देशों में कबीर की धुनों को पहुँचाया है।
भारतीय दूरदर्शन, ऑल इंडिया रेडियो के कई स्टेशन — इंदौर, भोपाल, जबलपुर, पटना, लखनऊ, कानपुर आदि — टिपानिया जी की कलाकारी का प्रसारण करते रहे हैं।
उनकी कला को कई राजकीय और प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया गया है:
- शिखर सम्मान (मध्य प्रदेश सरकार, २००५)
- संघीत नाटक अकादमी पुरस्कार (२००७)
- वर्ष २०११ में पद्मश्री से नवाज़े गए
सामाजिक संदेश और प्रतिबद्धता
टिपानिया जी सिर्फ़ कलाकार नहीं हैं, वे सामाजिक चेतना के प्रेषक हैं। उन्होंने “सदगुरु कबीर शोध संस्थान” की स्थापना की है, जहाँ कबीर की वाणी के अध्ययन, शोध और प्रचार-प्रसार का काम होता है।
उनका यह मानना है कि संगीत सिर्फ़ मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि इंसान को जोड़ने, सोचने, समझने और बदलने का माध्यम है। कबीर के दोहे जहाँ एक ओर आध्यात्मिकता की ओर ले जाते हैं, वहीं सामाजिक बुराइयों — जात-पात, अमीरी-गरीबी, अन्याय — के खिलाफ एक शांत लेकिन दृढ़ आवाज़ हैं।
सादगी, मूल्यों और संघर्षों का मेल
उनकी ज़िन्दगी में संघर्ष कम नहीं रहे — आर्थिक सीमाएँ, सांस्कृतिक अपेक्षाएँ, कला को जीवित रखने की चुनौतियाँ, और बदलते समय की धाराएँ। लेकिन टिपानिया जी ने न तो अपनी जड़ों को छोड़ा, न अपनी कला की सच्चाई को। उनके कपड़ों में, उनके बोल में, उनके मंच पर एक सहजता है। गाँव, खेत, लोक गीत की मिट्टी — ये सब उनकी पहचान का हिस्सा है।
शिक्षक के रूप में काम करना, गाँवों में घूम-घूमकर लोकभाषा, लोकगीत, लोकानुभव जुटाना — ये सब उनके व्यक्तित्व को निखारते आए हैं। उनकी छवि किसी बिंदु पर चमकदार स्टेज प्रेरित नहीं है, बल्कि धरती की गंध, लोगों का दर्द, आशाएँ और कहानियों की धुनों से बनी है।
राजनीति में प्रवेश
एक दिलचस्प मोड़ तब आया जब टिपानिया जी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल होकर लोकसभा चुनाव (२०१९) में देवास-शाजापुर संसदीय क्षेत्र से उम्मीदवार के रूप में भाग लिया।
यह कदम दर्शाता है कि वे सिर्फ़ कलाकार नहीं रहे, बल्कि समाज की सेवा, न्याय और समानता की राजनीति में भी कदम रखना चाहते हैं। लोकसभा चुनाव लड़ना, मंच बदलना नहीं बल्कि मुद्दे बदलना और उन मुद्दों की आवाज़ बनना — यह उनकी सोच का प्रतिबिम्ब है।
क्यों टिपानिया जी का संगीत आज भी अहम है?
- समय की कसौटी पर खरा : आज की तेज़-तर्रार ज़िन्दगी, सूचना की बाढ़, डिजिटल संगीत की झड़ी — इन सबके बीच टिपानिया जी ने लोक संगीत की मूल आत्मा को बचा कर रखा है। कहीं आधुनिकता की धुनों में मूल्यों का क्षय न हो जाए, इसके लिए उनकी आवाज़ ज़रूरत है।
- सार्वभौमिक मानवता का संदेश: कबीर की वाणी जाति, धर्म, सम्प्रदाय से ऊपर उठकर इंसानी रिश्तों, अहंकार, मैत्री, प्रेम और अनुकूलता की बात करती है। टिपानिया जी ने इसे लोकजन तक पहुँचाया है, उन तक जिन्होंने शायद कभी साहित्य पढ़ा न हो लेकिन कबीर सुनना जानता हो।
- शिक्षण और शोध का रंग: गीतों के बीच उनका शोध संस्थान, गीत संग्रह, ग्रामीण लोक कथाएँ, विभिन्न भौगोलिक और भाषाई तहों से कबीर की व्याख्या — ये सभी चीजें टिपानिया जी को मात्र कलाकार से अधिक सामाजिक दार्शनिक बनाते हैं।
- सशक्त आवाज़ और प्रेरणा: उनके जीवन से यह सीख मिलती है कि कला सिर्फ़ मनोरंजन नहीं, बल्कि अस्तित्व की ज़रूरत है; आवाज़ उठाने की ज़रूरत है। यदि कलाकार दिल से जुड़े, सच को बोलें — चाहे मंच बड़ा हो या छोटा — तो प्रभाव ज़रूर पड़ेगा।
चुनौतियाँ और भविष्य की राह
- लोक संगीत का आर्थिक पक्ष: कलाकारों को अक्सर उचित मानदेय नहीं मिलता, कार्यक्रमों के खर्चे, यात्रा, समय की मूल्यांकन कम होती है। टिपानिया जी जैसे कलाकार इस चुनौती का सामना कर आए हैं।
- नई पीढ़ी तक पहुँच: युवा पीढ़ी जो पॉप, बॉलीवुड संगीत आदि में रुचि रखती है, उनके बीच लोकगीतों की स्वीकार्यता बढ़ानी होगी। इसके लिए डिजिटल प्लेटफार्म, सोशल मीडिया, एवं अन्य माध्यम उपयोगी हो सकते हैं।
- भाषाई व पारंपरिक विविधता: मालवी लोक शैली जो स्थानीय बोलियों, यंत्रों, लोक परंपराओं से जुड़ी है, उसे संरक्षित करना आवश्यक है, ताकि ये विविधताएँ मिटें नहीं।
- नीतिगत समर्थन: सरकार, कलाकार संघों और संस्कृति विभागों से मजबूत समर्थन चाहिए — जैसे कि कलाकार को न्यायोचित भुगतान, लोक कलाएँ संरक्षित करने के कार्यक्रम, प्रशिक्षण कार्यशालाएँ आदि।
प्रहलाद सिंह टिपानिया सिर्फ़ एक लोकगायक नहीं, बल्कि एक संस्कृति के दूत हैं — कबीर की वाणी के द्वारा प्रेम, मानवता, अहिंसा और सामाजिक न्याय का संदेश देने वाले। गाँवों की मिट्टी से जुड़े, लोक परंपरा को सजोकर, आधुनिक मंचों पर भी उसका सरोकार बनाए रखते हुए, उन्होंने यह दिखाया है कि कला का असली ताज़ा स्मरण है — अपनी जड़ों से जुड़ना, समाज की आवाज़ सुनना और उसे जगाना।
उनकी ज़िन्दगी और कार्यों से प्रेरणा मिलती है कि अगर आवाज़ सच्ची हो, तो शब्द, स्वर और गीत समय की दीवारों को पार कर जाते हैं। टिपानिया जी ने कर दिखाया है कि लोक संगीत सिर्फ़ अतीत नहीं, वर्तमान और भविष्य की भी ज़रूरत है।
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