Best Hindi Bhajan Lyrics Collection for Spiritual Devotion

कबीर की वाणी : 5 अमर भजन

कबीर की वाणी : 5 अमर भजन

1. तूने रात गंवाई सोय

तूने रात गँवाई सोय के, दिवस गँवाया खाय के।
हीरा जनम अमोल था, कौड़ी बदले जाय॥

सुमिरन लगन लगाय के मुख से कछु ना बोल रे।
बाहर का पट बंद कर ले अंतर का पट खोल रे।

माला फेरत जुग हुआ, गया ना मन का फेर रे।
गया ना मन का फेर रे॥

भावार्थ:

संत कबीर जी हमें सच्चे सुमिरन (ध्यान-स्मरण) की सीख देते हैं। जीवन का अमूल्य समय व्यर्थ में सोने-खाने में चला जाता है, किंतु यदि ध्यान-योग की लगन से मन को पवित्र किया जाए तो मानव जन्म का सर्वोत्तम लाभ मिल सकता है। केवल माला फेरने या मुख से नाम लेने से नहीं, मन का फेर (बदलाव) होना चाहिए, तभी मोक्ष संभव है.

 

2. मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में

मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में।
जो सुख पाऊँ राम भजन में, सो सुख नाहिं अमीरी में॥

भली बुरी सब की सुनलीजै, कर गुजरान गरीबी में,
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में॥

आखिर यह तन छार मिलेगा, कहाँ फिरत मग़रूरी में,
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में॥

प्रेम नगर में रहनी हमारी, साहिब मिले सबूरी में,
कहत कबीर सुनो भयी साधो, साहिब मिले सबूरी में॥

भावार्थ:

कबीर ने भौतिक संपत्ति या गरिमा के बजाय ईश्वर भक्ति तथा सादगी को श्रेष्ठ बताया है। भजन, प्रेम, और संतोष में जो सुख है, वो पद, पैसा या दिखावे में नहीं मिलता. सच्चा सुख केवल सात्विक जीवन, राम भजन और सच्चे प्रेम में है। जीवन क्षणिक है, अतः अहंकार छोड़ प्रेम नगर में रहो, धीरे‑धीरे भगवान की प्राप्ति होती है।

 

3. नैया पड़ी मंझधार

नैया पड़ी मंझधार गुरु बिन कैसे लागे पार।
साहिब तुम मत भूलियो लाख लो भूलग जाये॥
हम से तुमरे और हैं तुम सा हमरा नाहिं।
अंतरयामी एक तुम आतम के आधार॥

जो तुम छोड़ो हाथ प्रभुजी कौन उतारे पार।
गुरु बिन कैसे लागे पार॥

मैं अपराधी जन्म को मन में भरा विकार।
तुम दाता दुख भंजन मेरी करो सम्हार॥

अवगुन दास कबीर के बहुत गरीब निवाज़।
जो मैं पूत कपूत हूं कहौं पिता की लाज॥

गुरु बिन कैसे लागे पार॥

भावार्थ:

कबीर दास जी का यह भजन अध्यात्मिक राह में गुरु के महत्व को दर्शाता है. मानव जीवन एक दलदल या मंझधार की नैया की तरह है; इसमें पार लगाने के लिए गुरु, भगवान की कृपा और परम श्रद्धा आवश्यक है। मनुष्य ज्ञानी या धनवान होकर भी यदि गुरु की आश्रय नहीं करता तो पार नहीं पा सकता।

 

4. रे दिल गाफिल गफलत मत कर

रे दिल गाफिल गफलत मत कर, एक दिना जम आवेगा।
सौदा करने या जग आया, पूजी लाया मूल गँवाया॥

प्रेमनगर का अन्त न पाया, ज्यों आया त्यों जावेगा॥
सुन मेरे साजन सुन मेरे मीता, या जीवन में क्या क्या कीता॥

सिर पाहन का बोझा लीता, आगे कौन छुड़ावेगा॥
परलि पार तेरा मीता खडिया, उस मिलने का ध्यान न धरिया॥

टूटी नाव उपर जा बैठा, गाफिल गोता खावेगा॥
दास कबीर कहै समुझाई, अन्त समय तेरा कौन सहाई॥

चला अकेला संग न को, किया अपना पावेगा॥

भावार्थ:

यह भजन जीवन की क्षणभंगुरता और आत्मा की अंत यात्रा की याद दिलाता है। कबीर चेतावनी देते हैं कि दुनियावी आकर्षणों और आलस्य में मत रहो, मृत्यु निश्चित है। जीवन समर्पण, साधुता और सजगता के लिए है — वर्ना अंतिम समय में कोई साथी नहीं होगा, ‌सिर्फ अपने किए हुए कर्म साथ ‌जाएँगे.

 

5. बहुरि नहिं आवना (या देस)

बहुरि नहिं आवना या देस॥
जो जो ग बहुरि नहि आ पठवत नाहिं सँस॥

सुर नर मुनि अरु पीर औलिया देवी देव गनेस॥
धरि धरि जनम सबै भरमे हैं ब्रह्मा विष्णु महेस॥

जोगी जंगम औ संन्यासी दिगंबर दरवेस॥
चुंडित मुंडित पंडित लो सरग रसातल सेस॥

ज्ञानी गुनी चतुर अरु कविता राजा रंक नरेस॥
को राम को रहिम बखानै को कहै आदेस॥

नाना भेष बनाय सबै मिलि ढूंढि फिरें चहुँदेस॥
कहै कबीर अंत ना पैहो बिन सतगुरु उपदेश॥

भावार्थ:

इस भजन में कबीर जीवन की अनश्वरता का स्मरण कराते हैं. यह जीवन बार-बार नहीं मिलता, संसार का भ्रम छोड़ कर सच्चे गुरु का उपदेश ग्रहण करना ही मनुष्य का कर्तव्य है। कोई भी, चाहे कितना भी ज्ञानी या शक्तिशाली क्यों न हो, सबको एक दिन जाना है, इसलिए भगवान के भजन और गुरु–शरण में ही जीवन सार्थक है।

 

कबीर भजन : अभ्यास का मार्ग और महत्ता

कबीर के भजनों का समाज में प्रभाव
कबीर दास जी के भजनों में समाज की हर परत के लिए संदेश हैं—आडंबर, जात-पात, दिखावा, पाखंड के खिलाफ वे दृढ़ स्वर उठाते हैं। साधना, सादगी और सद्भाव, समाज के लिए अजर-अमर राह दिखाते हैं। उनके गीत आत्मा को झकझोरते हैं, सत्य और करुणा के तत्व उजागर करते हैं।

कबीर भजन की साधना कैसे करें

  • हर सुबह भजन का अभ्यास करें—मन शुद्ध होगा।
  • भाव-सहित गायें—संगीत या वाद्य का ज्ञान हो तो और अच्छा।
  • मुख से बोलें, मन में अर्थ उतारें—यही कबीर की सच्ची साधना।
  • पारिवारिक, मंडली या एकाकी बैठकर श्रवण व गायन करें—प्रभाव कई गुना अधिक होता है।
  • सपाट गायन से बचें, हर पंक्ति में भाव पैदा करें—मन और आत्मा दोनों से जुड़ाव आता है।

कबीर भजन में जीवन के जड़-चेतन प्रश्नों के उत्तर

कबीर भजनों में —

  • मनुष्य जन्म की महानता
  • अंत समय की विवशता
  • अहंकार और लोभ का विनाशकारी रूप
  • गुरु के अनिवार्य मार्गदर्शन का संकेत
  • संपूर्ण मानवता के लिए प्रेम, समभाव, और साहसिक भक्ति का आदर्श उपस्थित है.

क्यों चुनें कबीर का भजन?

  • सरल भाषा, गूढ़ अध्यात्म।
  • धर्म और समाज से ऊपर मानवीयता।
  • समझने वाला हर पढ़ने-सुनने वाले का मार्गदर्शन करता है।
  • अभ्यास के साथ जीवन में सहज परिवर्तन आता है।

निष्कर्ष

कबीर दास जी के भजन न सिर्फ गाने के लिए हैं, बल्कि जीने के लिए भी हैं। इन भजनों का अभ्यास मन, वाणी, और आत्मा—तीनों को शुद्ध करता है, और समाज, धर्म, जात-पात जैसे बंधनों से ऊपर मानवीयता, प्रेम, और सादगी की प्रेरणा देता है. जब भी अवसर मिले, एकांत में या जन‑संग्रह में इन भजनों को गुनगुनाएँ, और जीवन को सार्थक बनाएं।

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