भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपरा में संत कबीर का नाम अमर है। उनके दोहे और भजन न केवल समाज को सत्य, ईमानदारी और समानता का मार्ग दिखाते हैं, बल्कि इंसान को खुद के भीतर झांकने की प्रेरणा भी देते हैं। इन भजनों को लोकधारा में जीवंत बनाए रखने का श्रेय कई लोकगायकों को जाता है। इन्हीं में से एक नाम है भेरू सिंह चौहान का, जिन्होंने मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र से कबीर भजनों और निर्गुण भक्ति परंपरा को न केवल जिया, बल्कि पूरे देश-दुनिया तक पहुँचाया।
प्रारंभिक जीवन और पृष्ठभूमि
भेरू सिंह चौहान का जन्म मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र में हुआ। यह क्षेत्र अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक और लोकसंगीत परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। बचपन से ही चौहान जी का झुकाव संगीत और भक्ति की ओर रहा। गाँवों और मेलों में कबीर भजनों की गूंज सुनकर उनके मन पर गहरा असर हुआ।
मालवा की मिट्टी में गूंजने वाले ढोलक, मंजीरा और एकतारा जैसे वाद्ययंत्रों की धुन ने उनके जीवन को कबीर की वाणी से जोड़ दिया। धीरे-धीरे वे कबीर के निर्गुण भजनों के न केवल गायक बने, बल्कि इन भजनों की आत्मा को भी अपने स्वर और जीवनशैली में आत्मसात कर लिया।
कबीर भजन और निर्गुण परंपरा
भेरू सिंह चौहान का गायन मुख्यतः निर्गुण भक्ति पर आधारित है। निर्गुण भक्ति वह परंपरा है जिसमें ईश्वर को किसी रूप, मूर्ति या प्रतिमा में नहीं बांधा जाता, बल्कि उसे निराकार, सर्वव्यापक और अनंत माना जाता है।
संत कबीर की वाणी भी इसी निर्गुण भाव को प्रकट करती है –
“मोको कहाँ ढूँढे रे बन्दे, मैं तो तेरे पास में”
“साँई इतना दीजिए, जामें कुटुंब समाय”
इन अमर वचनों को भेरू सिंह चौहान अपने लोकगायन में प्रस्तुत करते हैं। उनकी गायकी में न कोई आडंबर है, न ही शास्त्रीय संगीत की जटिलताएँ। बल्कि उनकी गायकी में लोकधारा की सहजता, आत्मा की पुकार और कबीर की गूंज सीधे श्रोता के हृदय में उतर जाती है।
संगीत यात्रा और लोक मंच
भेरू सिंह चौहान ने अपनी संगीत यात्रा की शुरुआत स्थानीय मेलों और धार्मिक आयोजनों से की। धीरे-धीरे उनकी लोकप्रियता बढ़ती गई और लोग उन्हें “कबीर के गायक” कहने लगे।
उनकी विशेषता यह रही कि वे कबीर भजनों को मालवी बोली और लोकधुनों के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं। इसका असर यह होता है कि साधारण से साधारण व्यक्ति भी उनके भजनों को समझ पाता है।
मालवा के गाँव-गाँव, चौपालों और मंदिरों में उनके भजनों की गूंज सुनाई देने लगी। समय के साथ उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी प्रस्तुति देने के अवसर मिले।
सामाजिक संदेश और लोकजागरण
भेरू सिंह चौहान केवल गायक नहीं, बल्कि समाज सुधारक भी हैं। उनके गायन का मुख्य उद्देश्य लोगों को सद्भाव, भाईचारा और सादगीपूर्ण जीवन जीने की प्रेरणा देना है।
कबीर की तरह ही वे भी यह संदेश देते हैं कि –
- धर्म का असली रूप इंसानियत है।
- जाति, पंथ और ऊँच-नीच का कोई महत्व नहीं।
- सच्ची भक्ति वही है जो भीतर से की जाए।
उनकी गायकी ने हजारों-लाखों लोगों को जीवन का असली रास्ता दिखाया। गाँवों में आज भी जब वे मंच पर आते हैं, तो श्रोता केवल संगीत का आनंद नहीं लेते, बल्कि जीवन का नया दृष्टिकोण लेकर जाते हैं।
पद्मश्री सम्मान
जनवरी 2025 में भारत सरकार ने भेरू सिंह चौहान को पद्मश्री सम्मान से अलंकृत किया। यह सम्मान उन्हें लोकसंगीत और विशेषकर कबीर भजनों की परंपरा को जीवित रखने और आगे बढ़ाने के लिए दिया गया।
पद्मश्री भारत का चौथा सर्वोच्च नागरिक सम्मान है और इसे पाना किसी भी कलाकार के लिए गर्व की बात है। चौहान जी के लिए यह सम्मान न केवल व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि पूरी मालवा लोकधारा और कबीर परंपरा के लिए सम्मान है।
भेरू सिंह चौहान की विशेषताएँ
- सरल और सहज प्रस्तुति – उनकी गायकी जटिल नहीं, बल्कि सहज है।
- लोकभाषा का प्रयोग – वे मालवी बोली और सरल हिंदी में भजन गाते हैं।
- आध्यात्मिकता का स्पर्श – हर प्रस्तुति में आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है।
- समाज सुधारक दृष्टिकोण – उनके भजनों में प्रेम, समानता और भाईचारे का संदेश मिलता है।
- लोक वाद्ययंत्रों का प्रयोग – मंजीरा, ढोलक, तम्बूरा आदि के साथ उनका गायन और प्रभावशाली बनता है।
अंतरराष्ट्रीय पहचान
भेरू सिंह चौहान की लोकप्रियता केवल भारत तक सीमित नहीं रही। उन्होंने विदेशों में भी कई मंचों पर प्रस्तुतियाँ दीं। विदेशी श्रोता भी कबीर की वाणी और निर्गुण भक्ति से गहराई से प्रभावित हुए।
उनका संगीत यह साबित करता है कि भक्ति और आध्यात्मिकता की भाषा वैश्विक होती है, जिसे किसी अनुवाद की आवश्यकता नहीं होती।
आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा
आज जब आधुनिक संगीत में आडंबर और व्यवसायिकता बढ़ रही है, ऐसे समय में भेरू सिंह चौहान नई पीढ़ी को यह संदेश देते हैं कि –
- संगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि आत्मा को जोड़ने का माध्यम भी है।
- लोकधारा और परंपराओं को जीवित रखना हर कलाकार का कर्तव्य है।
- सच्चा संगीत वही है जो मन को शांति दे और समाज को जोड़ने का कार्य करे।
- उनकी गायकी नई पीढ़ी के लोकगायकों और संगीत प्रेमियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
भेरू सिंह चौहान का जीवन और गायन इस बात का उदाहरण है कि एक सच्चा कलाकार समाज को बदलने की क्षमता रखता है। उन्होंने कबीर भजनों की अमर वाणी को न केवल जीवित रखा, बल्कि लाखों दिलों तक पहुँचाया।
उनका पद्मश्री सम्मान यह दर्शाता है कि लोकसंगीत और कबीर की वाणी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी सदियों पहले थी।
भेरू सिंह चौहान केवल एक गायक नहीं, बल्कि कबीर की आत्मा के वाहक हैं। उनकी गायकी में मालवा की मिट्टी की खुशबू है, इंसानियत का संदेश है और आत्मा को झकझोर देने वाली आध्यात्मिकता है।
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