मुखड़ा
उनके हाथों में लग जाए ताला, अलीगढ़ वाला…
सवा मन वाला,
जो मैय्या जी की ताली न बजाए ॥
अंतरा 1
माता के दरबार में देखो, भीड़ लगी है अपार ।
जो माता की जय न बोले, उनको है धिक्कार ।।
उनकी जिह्वा में लग जाए ताला, अलीगढ़ वाला…
सवा मन वाला,
जो मैय्या के जयकारे न लगाए ॥
अंतरा 2
माँ की मूरत ममता वाली, पावन दिव्य स्वरूप ।
सामने आके जो न देखे, माँ का प्यारा रूप ।।
उनकी आँखों में लग जाए ताला, अलीगढ़ वाला…
सवा मन वाला,
जो माँ के दर्शन को न जाए ॥
अंतरा 3
माँ के द्वारे आए लेकिन, कभी झुके न शीश ।
ऐसे लोगों को अम्बे का, कहाँ मिले आशीष ।।
उनके मस्तक पे लग जाए ताला, अलीगढ़ वाला…
सवा मन वाला,
जो माँ के आगे शीश न झुकाए ॥
अंतरा 4
ढोल–नगाड़े ढम–ढम बाजे, जयकारे की धूम ।
यहाँ खुशी में कोई निरंजन, अगर न जाए झूम ।।
उनके पैरों में लग जाए ताला, अलीगढ़ वाला…
सवा मन वाला,
जो आज खुशी में नाच न पाए ॥
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