भारतीय उपमहाद्वीप की भक्ति परंपरा में कबीर का नाम सर्वोपरि है। कबीर की वाणी आज भी समाज को जागृत करती है और उनके दोहे-भजन हर पीढ़ी को जीवन के गहरे सत्य से जोड़ते हैं। इस अमर वाणी को लोकधुनों में ढालकर आम जन तक पहुँचाने वाले कई लोकगायक हुए हैं। मालवा क्षेत्र (मध्यप्रदेश) में कबीर की वाणी को सहज, सरल और लोकधुनों में गाने वाले गुरुचरण दास ऐसे ही लोकप्रिय कबीर भजन गायक हैं।
प्रारंभिक जीवन और पृष्ठभूमि
गुरुचरण दास का संबंध मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र से है। मालवा लोकसंगीत की भूमि रही है जहाँ भक्ति, अध्यात्म और लोकधुनों का अद्भुत संगम मिलता है। गाँव की मिट्टी, खेत-खलिहान, और लोकभाषा की मिठास ने गुरुचरण दास के गायन को गहरी जड़ों से जोड़े रखा।
उन्होंने बचपन से ही लोकगीतों, भजनों और विशेषकर कबीर वाणी को सुनना और गाना शुरू किया। धीरे-धीरे यह रुचि साधना में बदल गई और कबीर के दोहों को लोकधुनों में पिरोना उनका जीवन का प्रमुख कार्य बन गया।
कबीर गायन की विशेषता
गुरुचरण दास का गायन लोकशैली पर आधारित है। वे भजनों में मुख्य रूप से मालवी लोकवाद्य का प्रयोग करते हैं, जैसे –
- तंबूरा
- मंजीरा
- ढोलक
- हारमोनियम
- खड़ताल
उनकी आवाज़ में एक गहराई और सहजता है। वे गाते समय श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देते हैं। उनके गाए भजन सिर्फ़ संगीत नहीं, बल्कि आत्मा को छूने वाले संदेश हैं।
प्रमुख भजन और प्रस्तुतियाँ
गुरुचरण दास ने कई कबीर भजनों को अपनी आवाज़ से लोकप्रिय बनाया है। उनके गाए कुछ प्रमुख भजन इस प्रकार हैं –
- मन मेल को धोया नहीं, तीर्थ जाने से क्या हुआ
- चरन कमल अब नहीं खोना
- गुरु भज लो रे थाम भया
- कर ले मेल गवारा गुरा जी से
इन भजनों की प्रस्तुति उन्होंने गाँव-गाँव, मेलों, संत समागमों और धार्मिक आयोजनों में की है। सोशल मीडिया और यूट्यूब के माध्यम से भी उनके भजन लोगों तक बड़ी संख्या में पहुँच रहे हैं।
सामाजिक संदेश
कबीर की वाणी हमेशा से जात-पात, ऊँच-नीच और धार्मिक आडंबर के खिलाफ रही है। गुरुचरण दास इन संदेशों को अपने गायन के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाते हैं।
उनके भजनों का मूल संदेश है –
- इंसान को इंसान से जोड़ना
- प्रेम और भाईचारे को बढ़ाना
- आत्मचिंतन और साधना की ओर प्रेरित करना
गुरुचरण दास का योगदान
- मालवा क्षेत्र में कबीर गायन की परंपरा को आगे बढ़ाया।
- कबीर की वाणी को लोकभाषा और लोकधुनों में गाकर आम जनता तक पहुँचाया।
- कई युवाओं को कबीर भजन गाने के लिए प्रेरित किया।
- सोशल मीडिया के ज़रिये आधुनिक पीढ़ी को भी कबीर वाणी से जोड़ा।
गुरुचरण दास उन लोकगायकों में से हैं जिन्होंने मालवा की धरा से जुड़कर कबीर की अमर वाणी को अपनी मधुर आवाज़ में प्रस्तुत किया। उनकी शैली लोकधुनों की मिठास और कबीर के गहरे संदेश का अद्भुत संगम है।
उनके भजन आज भी श्रोताओं को सिर्फ़ सुनने का आनंद नहीं देते, बल्कि आत्मा को झकझोरते हैं और जीवन का सच्चा मार्ग दिखाते हैं।
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