भारतीय संत परंपरा में कबीर, तुलसी, सूरदास और गुरुनानक की तरह मीरा बाई का भी विशेष स्थान है। मीरा केवल एक कवयित्री या संत नहीं थीं, बल्कि कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम और समर्पण की जीवित मूर्ति थीं। उनका जीवन संघर्ष, सामाजिक बंधनों से टकराव, और ईश्वर भक्ति के मार्ग में अटूट आस्था का उदाहरण है।
मीरा बाई ने अपने भजनों में प्रेम, वियोग, भक्ति और आत्मसमर्पण के भावों को अत्यंत सहज और हृदयस्पर्शी भाषा में व्यक्त किया है। उनके भजन सिर्फ गीत नहीं, बल्कि भक्ति और मुक्ति का मार्गदर्शन करने वाले अमृत वचन हैं।
इस लेख में हम मीरा बाई के 5 प्रमुख भजनों को प्रस्तुत कर रहे हैं, जिनमें उनके संपूर्ण बोल, भावार्थ और जीवन दर्शन निहित है।
1. पायो जी मैंने राम रतन धन पायो
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।
वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु, किरपा कर अपनायो।।
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।।
जनम जनम की पूँजी पाई, जग में सब ही खोवायो।
खर्च न होवे चोर न छीनै, दिन-दिन बढ़त सपायो।।
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।।
सत की नाव खरी उतारी, भवसागर तर आयो।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, हरि गुन गावत नाच्यो-बायो।।
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।।
भावार्थ
इस भजन में मीरा बाई ईश्वर-भक्ति को सबसे बड़ा धन मानती हैं। संसार का धन-वैभव नष्ट हो सकता है, चोरी हो सकता है, परंतु कृष्ण-भक्ति का धन कोई छीन नहीं सकता। यह जन्म-जन्मांतर की पूँजी है। भक्ति के सहारे ही जीवन के सागर से पार उतरा जा सकता है।
2. मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई
मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।
जा के सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई।।
ता कर चरण कमल में, मन मेरो लाग्यो।
अवधि भले ही जाए, मैं तो हरि गुण गाऊँ।।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, सहज सखा सोई।
जग के मोह मिटा दिए, अब न डर कोई।।
भावार्थ
इस भजन में मीरा अपने जीवन का स्पष्ट घोषणा करती हैं – उनके लिए कृष्ण ही पति, मित्र और परमेश्वर हैं। मीरा सांसारिक रिश्तों को त्यागकर केवल कृष्ण को अपना सर्वस्व मानती हैं। यह भजन वैराग्य और अनन्य भक्ति का अद्भुत उदाहरण है।
3. मैं तो सांवरिया के रंग राची
मैं तो सांवरिया के रंग राची।
मोरे तन मन बस्यो मोहन, बिरह बिनु रात न नींद साची।।
संग सखा सब छोड़े मोहे, नाते-रिश्ते तोड़े मोहे।
अब तो श्याम ही संगी साथी, जग में और न काची।।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, चरण कमल मन भायी।
उनके गुन गावत जीउ हरषै, मन मेरो मगन सुहाई।।
भावार्थ
यहाँ मीरा कहती हैं कि उनका तन-मन अब कृष्ण के रंग में रंग चुका है। सांसारिक रिश्ते चाहे टूट जाएँ, मीरा को कोई चिंता नहीं। उनके लिए कृष्ण ही संगी, साथी और सहारा हैं। यह भजन ईश्वर-प्रेम की उस स्थिति का चित्रण है जहाँ भक्त अपनी पहचान और अहंकार खो देता है।
4. उड़ जाएगी हंस अकेला
उड़ जाएगी हंस अकेला,
जग दर्शन का मेला।।
साथ न देगा माया-मोहमाया,
सब रह जाएगा झूठा सहारा।
तू क्यों भूल भया रे अरेला।।
मीरा कहे प्रभु गिरधर नागर,
भक्ति बिना सब सूना-सूना।
नाम जपै तो पार उतारा,
और सब कुछ है झमेला।।
भावार्थ
मीरा इस भजन में मृत्यु और जीवन की नश्वरता का स्मरण कराती हैं। मनुष्य अकेला आया है और अकेला ही जाएगा। सांसारिक मोह-माया, धन और रिश्ते अंत समय में साथ नहीं देंगे। केवल ईश्वर-भक्ति ही सच्चा सहारा है।
5. जोगिया रंग दे चुनरिया
जोगिया रंग दे चुनरिया।
मोरे श्याम रंग में रंग दे,
सद्गुरु दीन्ही अनमोल वर्दी,
मोरिया रंग दे चुनरिया।।
चुनरी में मोहे दाग लगा दो,
प्रीतम प्यारे मन भा दो।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर,
सदा रंग दे मोरी चुनरिया।।
भावार्थ
यह भजन मीरा के अनन्य समर्पण का प्रतीक है। वह कहती हैं कि उनकी जीवन-चुनरिया (आत्मा) को केवल श्याम के रंग में रंग दिया जाए। यह रंग कभी फीका नहीं पड़ता। यहाँ चुनरी आत्मा का प्रतीक है और रंग ईश्वर का प्रेम।
मीरा बाई का जीवन दर्शन
मीरा बाई का जीवन संघर्षमय था। राजघराने में जन्म लेने के बावजूद उन्होंने सांसारिक ऐश्वर्य छोड़कर कृष्ण भक्ति को अपनाया। परिवार और समाज ने उनके मार्ग में अनेक बाधाएँ डालीं, परंतु मीरा डिगीं नहीं।
उनकी भक्ति की विशेषताएँ:
- अनन्य प्रेम: मीरा ने कृष्ण को पति, मित्र और स्वामी मान लिया।
- समर्पण: उन्होंने हर पीड़ा को प्रभु का प्रसाद माना।
- सादगी: भजन और नृत्य ही उनका जीवन बन गए।
- साहस: समाज के बंधनों से टकराकर भी अपने मार्ग पर अडिग रहीं।
मीरा बाई के भजनों का समाज पर प्रभाव
- मीरा के भजन आज भी मंदिरों, घरों और संगीत सभाओं में गाए जाते हैं।
- उनकी रचनाएँ स्त्री-स्वतंत्रता और आत्मिक शक्ति का प्रतीक हैं।
- मीरा ने समाज को सिखाया कि सच्ची भक्ति जाति, लिंग या पद से ऊपर है।
- उनके गीत संगीत, साहित्य और संस्कृति में आज भी अमर हैं।
आधुनिक जीवन में मीरा बाई के भजनों की प्रासंगिकता
- आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में मीरा के भजन आंतरिक शांति देते हैं।
- वे हमें याद दिलाते हैं कि धन, पद और दिखावा नश्वर है।
- आत्मा की सच्ची तृप्ति केवल भक्ति, प्रेम और सादगी में है।
- मीरा का जीवन हर इंसान को साहस देता है कि सच्चाई और प्रेम के मार्ग पर डटे रहें।
निष्कर्ष
मीरा बाई के भजन केवल गीत नहीं हैं, वे आत्मा की पुकार हैं। इन 5 भजनों में हमें भक्ति, प्रेम, त्याग, साहस और जीवन की सच्चाई का दर्शन मिलता है। मीरा की वाणी हर युग में जीवित है और इंसान को ईश्वर से जोड़ने का मार्ग दिखाती है।
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